दुर्गा देवी स्तोत्र – Durga Stotra Marathi

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दुर्गा देवी स्तोत्र – Durga Stotra Marathi

श्रीदुर्गा स्तोत्र (मराठी)

श्रीगणेशाय नमः। श्री दुर्गायै नमः।

नगरांत प्रवेशले पंडुनंदन। तो देखिले दुर्गास्थान।

धर्मराज करी स्तवन। जगदंबेचे तेधवा ॥ १ ॥

जय जय दुर्गे भुवनेश्वरी। यशोदा गर्भ संभवकुमारी।

इंदिरा रमण सहोदरी। नारायणी चंडिकेंऽबिके ॥ २ ॥

जय जय जगदंबे विश्र्व कुटुंबिनी। मूलस्फूर्ति प्रणवरुपिणी।

ब्रह्मानंदपददायिनी। चिद्विलासिनी अंबिके तू ॥ ३ ॥

जय जय धराधर कुमारी। सौभाग्य गंगे त्रिपुर सुंदरी।

हेरंब जननी अंतरी। प्रवेशीं तू आमुचे ॥ ४ ॥

भक्तह्रदयारविंद भ्रमरी। तुझे कृपाबळे निर्धारी।

अतिगूढ निगमार्थ विवरी। काव्यरचना करी अद् भुत ॥ ५ ॥

तुझिये कृपावलोकनेंकरुन। गर्भांधासी येतील नयन।

पांगुळा करील गमन। दूर पंथे जाऊनी ॥ ६ ॥

जन्मादारभ्य जो मुका। होय वाचस्पतिसमान बोलका।

तूं स्वानंदसरोवर मराळिका। होसी भाविकां सुप्रसन्न ॥ ७ ॥

ब्रह्मानंदे आदिजननी। तव कृपेची नौका करुनि।

दुस्तर भवसिंधु उल्लंघूनी। निवृत्ती तटां जाइजे ॥ ८ ॥

जय जय आदिकुमारिके। जय जय मूलपीठनायीके।

सकल सौभाग्य दायीके। जगदंबिके मूलप्रकृतिके ॥ ९ ॥

जय जय भार्गवप्रिये भवानी। भयनाशके भक्तवरदायिनी।

सुभद्रकारिके हिमनगनंदिनी। त्रिपुरसुंदरी महामाये ॥ १० ॥

जय जय आनंदकासारमराळिके। पद्मनयने दुरितवनपावके।

त्रिविधतापभवमोचके। सर्व व्यापके मृडानी ॥ ११ ॥

शिवमानसकनकलतिके। जय चातुर्य चंपककलिके।

शुंभनिशुंभदैत्यांतके। निजजनपालके अपर्णे ॥ १२ ॥

तव मुखकमल शोभा देखोनी। इंदुबिंब गेले विरोनी।

ब्रह्मादिदेव बाळें तान्ही। स्वानंदसदनी निजविसी ॥ १३ ॥

जीव शिव दोन्ही बाळकें। अंबे त्वां निर्मिली कौतुकें।

स्वरुप तुझे जीव नोळखे। म्हणोनि पडला आवर्ती ॥ १४ ॥

शिव तुझे स्मरणीं सावचित्त। म्हणोनि तो नित्यमुक्त।

स्वानंदपद हातां येत। तुझे कृपेनें जननिये ॥ १५ ॥

मेळवूनि पंचभूतांचा मेळ। त्वां रचिला ब्रह्मांडगोळ।

इच्छा परततां तत्काळ। क्षणें निर्मूळे करिसी तूं ॥ १६ ॥

अनंत बालादित्यश्रेणी। तव प्रभेमाजी गेल्या लपोनि।

सकल सौभाग्य शुभकल्याणी। रमारमणवरप्रदे ॥ १७ ॥

जय शंबरि पुहर वल्लभे। त्रैलोक्य नगरारंभस्तंभे।

आदिमाये आत्मप्रिये। सकलारंभे मूलप्रकृती ॥ १८ ॥

जय करुणामृतसरिते। भक्तपालके गुणभरिते।

अनंतब्रह्मांड फलांकिते। आदिमाये अन्नपूर्णे ॥ १९ ॥

तूं सच्चिदानंदप्रणवरुपिणी। सकल चराचर व्यापिनी।

सर्गस्थित्यंत कारिणी। भवमोचिनी ब्रह्मानंदे ॥ २० ॥

ऐकोनि धर्माचे स्तवन। दुर्गा जाहली प्रसन्न।

म्हणे तुमचे शत्रू संहारीन। राज्यीं स्थापीन धर्माते ॥ २१ ॥

तुम्ही वास करा येथ। प्रगटी नेदीं जनांत।

शत्रू क्षय पावती समस्त। सुख अद् भुत तुम्हां होय ॥ २२ ॥

त्वां जें स्तोत्र केलें पूर्ण। तें जे त्रिकाल करिती पठन।

त्यांचे सर्व काम पुरवीन। सदा रक्षीन अंतर्बाह्य ॥ २३ ॥

॥ इति श्रीयुधिष्ठिरविरचितं श्रीदुर्गा स्तोत्रं संपूर्णम् ॥

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